मौन व्रत धारण कर सब बैठे हैं
अबला का चीरहरण देख सब नेत्रहीन हो बैठे हैं ।
उसकी चीखें सुन सब बहरे हो बैठे हैं ,
अन्याय की गूंज सुन सब गूंगे हो बैठे हैं ।
देवी की देह आखेट समझ उसको चौसर में बेच बैठे हैं,
सब गूंगे ,बहरे और अंधे हो बैठे हैं ।
अन्याय देख स्वयं की इज्जत पर लांछन लगा बैठे हैं ,
देवी को कलंकित कहते हैं ।
न्याय की देवी पट्टी लगा विपक्ष में बैठी है ,
अन्याय को देख अपने भी विवश होकर बैठे हैं ।
द्वापर युग हो या कलयुग ,
अन्याय को देख सब गूंगे ,अंधे और बहरे हो बैठे हैं ।
हर युग में कृष्ण जैसा युगपुरुष तो नहीं होगा ,
जो देवी को चादर ओढ़ उसकी रक्षा करेगा ।
कलयुग में हर प्राणी की चेत उजागर कर ,
उसे युगपुरुष का रूप दे, ब्रह्मास्त्र चलाना होगा ।
अन्याय की तरफ आवाज उठा ,
हर अबला को बचाना होगा ।।