यूं कब किसने मुझको अपना कहा है,
उसने भी तो मुझे पराया कहा है!
मेरी शख्सियत कहा है कि उसे पसंद आऊ,
मेरा तो जमीन ही ठिकाना रहा है!
प्यास बुझानी हो तो नदी ही बन,
समुंदर कब किसका दुलारा रहा है!
सिद्दत से जिसे चाहा था "जय",
मै नहीं जहां उसको प्यार रहा है!