गुरुकृपायोगानुसार करने योग्य साधना का नियम कर्मयोग, भक्तियोग,ज्ञानयोग, -ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़
--------------------------------------------------------गुरुकृपायोगानुसार करने योग्य साधना का नियम
कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग आदि किसी भी मार्ग से साधना करने पर भी बिना गुरुकृपा के व्यक्ति को ईश्वरप्राप्ति होना असंभव है । इसीलिए कहा जाता है, गुरुकृपा हि केवलं शिष्यपरममङ्गलम् ।, अर्थात शिष्य का परममंगल अर्थात मोक्षप्राप्ति, उसे केवल गुरुकृपा से ही हो सकती है । गुरुकृपा के माध्यम से ईश्वरप्राप्ति की दिशा में अग्रसर होने को ही गुरुकृपायोग कहते हैं । गुरुकृपायोग की विशेषता यह है कि यह सभी साधनामार्गों को समाहित करनेवाला ईश्वरप्राप्ति का सरल मार्ग है ।
☀ गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुदेव महेश्वर...
विभिन्न योगमार्गों से साधना करने में अनेक वर्ष व्यर्थ न गंवाकर अर्थात अन्य समस्त मार्गों को छोडकर किस प्रकार शीघ्र गुरुकृपा प्राप्त की जा सकती है, यह गुरुकृपायोग सिखाता है ।
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गुरुकृपा होने के लिए गुरुप्राप्ति होना आवश्यक है । गुरुकृपा तथा गुरुप्राप्ति हेतु की जानेवाली साधना ही गुरुकृपायोगानुसार साधना है । गुरुकृपायोगानुसार साधना के विषय में सर्वांग से और व्यापक दिशादर्शन प्रस्तुत लेखमाला में किया है । इस पहले लेख में हम प्राणिमात्र के जीवन का उद्देश्य, विज्ञान की मर्यादा और अध्यात्म का महत्त्व, गुरुकृपायोगानुसार की जानेवाली साधना के सिद्धांत का विवेचन देखेंगे ।
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१. प्राणिमात्र के जीवन का उद्देश्य – आनंदप्राप्ति
मनुष्य ही नहीं, प्रत्येक प्राणिमात्र जन्म से अंतिम श्वास तक, अविरत सुखप्राप्ति होने हेतु संघर्षरत रहता है । सर्वोच्च एवं निरंतर प्राप्त होनेवाला सुख ही आनंद कहलाता है । संक्षेप में, आनंदप्राप्ति ही प्राणिमात्र के जीवन का एकमात्र उद्देश्य है । हम जीवन में अनेक विषय सीखते हैं; परंतु आनंद कैसे प्राप्त करें, यह नहीं सीखते । इस जगत में आनंदमय केवल ईश्वरीयतत्त्व है । अर्थात आनंदप्राप्ति के लिए ईश्वरप्राप्ति करना आवश्यक है ।
२. प्रत्यक्ष जीवन, विज्ञान की मर्यादा एवं अध्यात्म का महत्त्व
प्रत्येक के जीवन में कुछ प्रासंगिक घटनाएं घटित होती हैं । उदाहरणार्थ हमारे किसी निकटतम व्यक्ति की अकाल मृत्यु हो जाती है; किसी का विवाह ही नहीं होता; किसी के बच्चे ही नहीं होते; बच्चे हुए भी तो केवल बेटियां होती हैं; किसी को चाकरी (नौकरी) नहीं मिलती; किसी का व्यवसाय नहीं चलता… कितना भी प्रयास करें असफलता ही मिलती है । ऐसा क्यों होता है, यह विज्ञान नहीं बता सकता । इस प्रश्न का उत्तर अथवा इन घटनाओं की तीव्रता कैसे न्यून की जाए, यह भी केवल अध्यात्मशास्त्र ही सिखाता है ।
३. साधना का अर्थ क्या है ?
अध्यात्मशास्त्र के दो भाग हैं – एक है सैद्धांतिक भाग । गीता, रामचरितमानस, ज्ञानेश्वरी, दासबोध इत्यादि ग्रंथों का अभ्यास अध्यात्म का सैद्धांतिक भाग है । दूसरा है प्रायोगिक भाग । इसमें शरीर, मन एवं बुद्धि से कुछ न कुछ कृत्य करना पडता है । इस प्रायोगिक भाग को ही साधना कहते हैं ।
४. गुरु
४ अ. गुरु की आवश्यकता
१. अकेले साधना कर अपने बल पर ईश्वरप्राप्ति करना अत्यधिक कठिन होता है । इसकी अपेक्षा आध्यात्मिक क्षेत्र के किसी अधिकारी व्यक्ति की, अर्थात गुरु अथवा संत की कृपा प्राप्त कर लें, संपूर्ण लेख प्राप्त करने के लिए अपना व्हाट्सएप नंबर दें ब्रह्मदत्त