गजल
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इक फूल सा ख्वाबों में खिलता नजर आता है।
अरमान मिरा उनसे मिलता नजर आता है।।
जब साथ उनका पाया, तो लग रहा ऐसा।
उम्मीद का चिराग अब, जलता नजर आता है।।
उसको तो हो चुकी है, आदत ही आंसुओं की।
कांटों पे हमें अक्सर चलता नजर आता है।।
न जाने क्यों हुआ है, बेदर्द ये जमाना।
हमको हमारा यारों छलता नज़र आता है।।
उम्मीद उमा उससे बेशक लगाई लेकिन।
उम्मीद का ये सूरज ढलता नज़र आता है।।
उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित