तन्हाई
भीड़ में है हम बिलकुल अकेले,
यह तन्हाई का दर्द हम कैसे झेले ।
कोई तो बताए, कब तक हम जिएंगे, यूहीं तन्हाई में अकेले
यु तो महफिलें सजती है, फिर भी तन्हाई हमें दंस ती है;
आजकल, हमारी तो परछाई भी हम पर हसती है ।
कोई बताए, यह तन्हाई का दर्द हम कब तक और कैसे झेले ???
लोग जब हस ते खेलते है, तब हम अपने अकेले पन से डरते है ;
और फिर हम मुरझाए फूलों जैसा चेहरा लिए फिरते है ।
तकदीर में क्या लिखा के आए है, जानते नहीं हम
जानते नहीं कैसे जिएंगे यूहीं तन्हाई में, सीने में छुपाए गम
Armin Dutia Motashaw