सत्यार्थ चल कर देखना है
इस सभा में,उस सभा में,
कंटकभरी राह तो है
फूल बनकर देखना है।
बुझ गये दिये अगर
फिर जलाने आ गये हैं,
चुप हो गये शब्द अगर
फिर बोलने पहुँच गये हैं।
सत्यार्थ चल कर देखना है
इस युद्ध में,उस युद्ध में,
महाभारत के चक्रव्यूह में
न्याय बन कर देखना है।
हमें आधी बात को
पूर्ण करने पहुँचना है,
हम नहीं पहुँचे लक्ष्य पर
तो किसी और को देखना है।
सत्यार्थ चल कर देखना है
इस सभा में,उस सभा में,
कंटकभरी राह तो है
फूल बनकर देखना है।
*महेश रौतेला