*दरमियाँ *
अब इतने फ़ासले है दरमियाँ हमारे
मानो पूरा जहाँन हो दरमियाँ हमारे
उसे वक़्त नहीं मुझे फिर से याद करने का
अब कोई बाते भी नहीं है दरमियाँ हमारे
रोज सोचता हूँ उस आख़री मुलाक़ात को
अब कोई मुलाक़ात नहीं है दरमियाँ हमारे
सुना है वक़्त मरहम है हर दर्द का
ये वक़्त भी थम गया उस आख़री रात से ..दरमियाँ हमारे
अब इतने फ़ासले है दरमियाँ हमारे
सिर्फ़ कहानियों में सच्ची मोहब्बत मिलती है
ऐसी कोई कहानी नहीं मिली दरमियाँ हमारे
मैंने देखा है रूठ कर वापस आते लोगों को
क्या वापस आने की कोई वजह है दरमियाँ हमारे
अब इतने फ़ासले है दरमियाँ हमारे ......
-A A राजपूत “अक्श”