बेटी इस घर से
बेटी इस घर से
उस घर में जाती है,
और मेरे अन्दर कुछ
सुख छोड़ जाती है।
बेटी इस आँगन से
उस आँगन में जाती है,
और मेरे अन्दर कुछ
खुशी छोड़ जाती है।
बेटी इस क्षितिज से
उस क्षितिज तक उड़ती है,
और मेरे अन्दर एक
उड़ान भर जाती है।
बेटी स्वभावतः
इधर से उधर जाती है,
और मेरे लिये चुपचाप
शान्ति और सुषमा रख जाती है।
बेटी जब भी
मन में दिखती है,
मुझे एकांतिक
खुशी दे जाती है।
*महेश रौतेला