अकेला हूँ
अकेला हूँ
शव में,श्मशान में
शिव में
तीर्थ में,तीर्थाटन में
तथागत की भाँति,
आँधी में,अँधियारे में
धूप में,धूल में
राह में,राह से आगे।
अकेला
धुँध की भाँति
कोहरे की तरह,
क्षीण आवाज में,
सुब-शाम सा
उगता-अस्त होता,
मन से गुनगुनाता
क्षणिक विश्वास लिये।
सच-झूठ को खींचता
मनुष्य बन
मौन हूँ।
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*महेश रौतेला