इंसाफ करें
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बढ़ता देख कर ये दुष्कर्म,
व्यतित हो रहा मेरा मन
जाने कब होगा ये ख़त्म,
जला जा रहा है अन्तर्मन
बढ़े जा रहे हैं ये दुष्कर्मी,
इन की दुनियाँ में नही कमी
जाने ये किस रूप में आये
पहचान उनकी कौन बताये
रावण, बालि, दुर्योधन भी,
वैसे तो थे वो बड़े ही धर्मी,
किन्तु स्त्री की लाज्ज को,
कर दिया छलनी - छलनी,
पुरुषोत्तम श्री राम ने माना,
बहन,माता,पुत्री या परस्त्री,
जो कोई इन पर डाले कुदृष्टि,
मिटा के रख दो उसकी हस्ती
फिर क्यू हम इतना विचार करें,
आओ चलो अब इंसाफ करें ।
उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित