खजूर पेड़ नीचे
छांव की तलाश में
पुरा मुल्क लगा है
इंसान की सूरत में
अब कमियां तलाशने
पुरा शहर लगा है
इधर इंसान, इन्सान की
मौत बेचने
खुद इन्सान लगा है
आरती, पूजा, प्रसाद
भगवान की__ खरीदने मे
खुद भक्त लगा है
मिट्टी की मूरत में
भगवान तलाशने का
अब पुरा बाजार लगा है
शांति, इंसानियत, आस्था
का प्यारा बसंत
अब मुरझाने लगा है
मृदु भावनाओ के शब्द सारे
शब्द्कोश मे दिखते है
अब आवरण ही
मेरे बाजार मे बिकते है