अल्हड़ रूपसी
मोती सी दुधिया दाँत,हीरे सी चमकती आँख,
लाली लिए ओठ के ऊपर सुन्दर सुतवां नाक।
सुराहीदार सुडौल गर्दन,पर्वत से उभरे स्तन,
कमान सी कमर पर केशों के बलखाते फ़न ।
ऐसी एक रूपसी बाला,मन में मचाये हलचल।
जिया में उठती लहरें ,गाये गीत मचल मचल।
हर आहट में उसकी ख़ुश्बू ,हर साँस में तराना,
झरनों की तान जैसी,पायल का झुनझुनाना।
मासूमियत ऐसी कि झुकी नज़रों में मुस्कुराये,
उन्मुक्त चंचल अदाएं अल्हड़ घटा सी इठलाये
मुक्तेश्वर मुकेश