मैं तुमको बीवी कभी नहीं बनाऊंगा,
दुनिया कहेगी तुम्हे मालकिन घर की,
पर बर्ताव करेंगे सब घर के मजदूरों सा।
शायद मैं भी उन सब जैसा ही हो जाऊं,
पुरुष-प्रधान समाज में पुरषत्व पे इतराऊं।
अभी फूल तुम्हे मानकर कांटे सारे चुन लेता हूँ
तब मैं काँटा खुद बनकर तेरे बिस्तर पे बिछ जाऊँ।
तुम सबकी ख़ुशियों को भागी भागी फिरोगी,
मेरी होकर भी मेरे घर में परायी ही रहोगी।
शायद कल को सारी परेशानियों का तुमको दोष दूँ,
बिगड़ी सब बातों का ठीकरा तुम्हारे सर पे फोड़ दूँ।
अभी हक़ देता हूँ तुमको खुद से रूठ जाने का,
कल को तुम रूठो तो शायद मनाना भी छोड़ दूँ।
अभी सुनता हूँ, समझता हूँ तुम्हारी बातें ठीक लगती हैं,
शायद फिर राय भी न माँगूँ, निर्णयों से भी तुम्हारा रुख मोड़ दूं।
फिर से कहता हूँ तुमको बीवी नहीं बनाऊंगा,
तुम्हारे नाम के आखिर में अपना कुलनाम नहीं लगाउँगा।
प्रेमिका शब्द को व्यर्थ समझ तो लिया दुनिया ने,
इस शब्द के मान को पत्नी नाम से बड़ा कर दिखाउँगा।
बिना ब्याह किये तुम्हे हक़ सारे अदा करता हूँ,
प्रेमिका हो प्रेमिका ही रखूँगा, बिन फेरे वचन भरता हूँ।
बिन मांग भरे संग अपने घर तुमको ले आऊँगा,
सुबूत जो मांगेगी दुनिया छाती पर तेरा नाम दिखाउँगा।।
न चूड़ी न बिछिया न भार मंगलसूत्र का लादूँगा,
जिस अस्तित्व से जन्म लेकर आई हो तुम इस जग में,
उसमें सम्मिलित होकर इक नया सूत्र मढ़ दूँगा,
पति परमेश्वर होने का मोह त्याग दिया मैंने,
तुम्हे इष्ट सखी औ परम मित्र का पद दूँगा।
तुम्हें संसार मानकर तुम्हारा संसार माँगता हूँ,
ओ प्रेमिका, सदा के लिए तुम्हारा प्यार माँगता हूँ।।
ओ प्रेमिका, सदा के लिए तुम्हारा प्यार माँगता हूँ।।।