अब मैं मुझसे अक्सर ये कहता हूँ...
कितना और कुरेदोगे इन तूफान ख़्यालों को ?
देखो खून जम आया है मन की सतहों पे!
इससे भी गहरा कुछ और लिखोगे क्या ?
कैसे रक्त लपेटोगे चिकने चुपड़े शब्दों पे!
नुचे टूटे लफ़्ज़ों से आह-चीखें नहीं निकलतीं ?
कौन से हर्फ़ अब तोड़कर बिखराओगे सफ़होँ पे!
अब तुम्हारे अल्फ़ाज़ समेट नहीं पाते एहसासों को,
ठग हैं, छल-कपट से लिपटे मालूम होते हैं।
पढ़कर अब तुम्हारी कविता दिल नहीं दरक़ता,
बस तुम्हारे स्वार्थ की नुमाईश मालूम होते हैं।
रोज़ फिज़ूल सी बातों का मज़मा लगाते हो,
सारे राज़ लुटा देने वाले पागल मालूम होते हैं।
बाज़ार बनाने पे क्यूँ तुले हो,
सच्चे झूठे जज़्बातों को ?
खुद पर ढक कर आवरण प्रेम का,
दोष दे दिया हालातों को ?
कब तक खुद को बचाते फिरोगे,
कवच बनाकर अल्फ़ाज़ों को ?
क्यूँ अपना हमनफ़स बना लिया,
गहरे अँधेरे सन्नाटों को ?
कितना और कुरेदोगेे इन तूफ़ान ख़्यालों को ??
और मैं लिख देता हूँ फिर से फिज़ूल सी कोई कविता !!