एक अनजान तलाश की तरफ
जब बढ़ रहे थे नन्हें कदम
उस तलाश को सपनों का नाम दे कर
ज़माना बरगलाता रहा
फिर उसके पीछे भागते हुए
पहले बचपन दम तोड़ गया
फिर जवानी
अधेड़ उम्र में उसकी कच्ची नींव भी नहीं दिखी
बुढ़ापा वक़्त से पहले आया
मौत देर करती रही
मैं जीता रहा
कुछ और नन्हें क़दमों को बरगलाने को
अब उस अनजान तलाश में मैंने
शून्य को पाया है
ज़माना सही कहता था
यही मेरे सपने थे।