उन दिनों को ऐसे मत छेड़ो
कि गुस्सा आ जाय,
कोई पत्थर हाथ में आकर
किसी को लहूलुहान कर दे।
उन दिनों को इतना मत बोलो
कि चिड़चिड़ापन उभर आय
जिह्वा फिसल जाय
और कोई आन्दोलन खड़ा हो जाय।
उन दिनों को इतना याद न करो
कि प्यार का बाँध टूटने लगे,
मुस्कान में कोई छेद बन जाय
और हिलता हुआ हाथ खाली लगे।
उन दिनों को इतने जोर से न पकड़ो
कि टूट-फूट कर झड़ने लगें,
फिर दूर-दूर तक दिखायी न दें
और सारे इतिहास में एकदम अकेले लगें।
उन दिनों से कभी-कभी बात कर लें
कान उनकी ओर लगा लें,
एक हल्की थपथपाहट उन्हें दे
कदमों को आगे बढ़ा लें।
*महेश रौतेला