खेतो के बीच
खेतों के बीच
कितने कितने दिनों से
आज तक
चीर कर धरती का सीना
बो कर अपना पसीना
उगाता है वह
सभी के लिए अनाज के दाने
भीड़ भरे चौराहे से
जिसे लोग बाजार कहते हैं
लौटता है वह
खाली-खाली
उसके मेहनत की
मीठी कमाई
दब जाती है
पथरीले सीने
और थुल-थुल पेट के नीचे
जो छीन लेते हैं
हमारे पूरे अधिकारों को
क्योंकि अलग अलग है
हमारी मेड़ पार
खेतों के बीच