घर से चिट्ठी आयी
घर से चिट्ठी आयी
कि पिछले वर्ष से इस वर्ष
ज्यादा रही मँहगाई।
खाँसी बढ़ती जा रही
साँसें दुखती हैं,
मन पर खर्च का बोझ
हमेशा रहता है।
नाते-रिश्ते निभते नहीं,
घर की बल्ली टूट चुकी,
छत का चूना जारी है,
भूकम्प दीवार में
गहरी दरार बना
मन में ठहरा है।
खम्भा जो लगाया
उसमें सीमेंट लगानी शेष है,
पर यह सब चलता है,
अपने स्वास्थ्य का
ध्यान रखना,
खुली हवा में घूम
मन हल्का कर लेना।
गर्मी की छुट्टियों में
जरूर घर आना,
गत वर्ष पड़ी खाइयों को
इस वर्ष भर लेना है।
**महेश रौतेला