द्वीपदानोत्सव पर विशेष
अप्प दीपो भव ।
दोस्तों यह दिवाली का उत्सव हमारी संस्कृति का कोई भाग रहा हो या न रहा हो, मुझे नही पता और न ही इसके कोई ठोस प्रमाण मिलते है । कुछ विचारकों द्वारा अलग अलग तिथियों में, भिन्न भिन्न कारणों से इस प्रकार के उत्सवों का जिक्र मिलता है । परन्तु एक बात तय है कि यह उत्सव, किसी राम या अयोध्या से बिल्कुल भी सम्बंधित नही है । क्योंकि किसी भी रामायण में किसी द्वीपोत्सव की तिथि व माह का जिक्र नही मिलता है । प्रश्न यह है कि रामायण के लेखक इतने महत्वपूर्ण उत्सव की तिथि और मास का जिक्र करना क्यों भूल गए ?
दिवाली या दीपावली किसी भी कारण से आप मना रहे हों, फिर भी इतना ध्यान रखें कि हमारी संस्कृति में हमेशा एक बात तो रही है कि हमारे पूर्वज प्रकृति पूजक थे, इसलिए यह उत्सव यदि संस्कृति का हिस्सा भी रहा होगा, तो कोई अच्छा सन्देश ही देता होगा । पर्यावरण को दूषित करना , भय-आडम्बर , ढोंग या मूर्ति पूजा बिल्कुल भी नही रहा होगा ।
इसलिए आपसे यही कहना चाहूंगा, कि पर्यावरण को स्वच्छ रखें , ढोंग, आडम्बर और अंधविश्वास का प्रचार न करें । प्रकाश उतना ही फैलाएं जितने में किसी गरीब का झोपड़ा/घरौंदा न जले। पटाखे और बारूद से उड़ते धुँए से आप आनंद भले ही ले रहे हों, परन्तु निश्चित ही आप अपना ही जीवन नष्ट कर रहे हैं ।यदि आप तथागत के इस कथन "अप्प दीपो भाव " को सार्थक करें, ज्ञान के प्रकाश से स्वयं प्रकाशित हों, तो एक भी दिया जलाने की जरूरत नही पड़ेगी । जब मनुष्य के भीतर का अंधकार मिट जाएगा, तब न तो निर्मम हत्याएं होंगी , न बलात्कार होंगें , मनुष्य मनुष्य में भेद मिट जाएगा , नारी को उचित सम्मान मिलेगा , रात के अँधेरे में भी बेटियाँ सुरक्षित रहेंगीं, ऐसा मेरा विश्वास है ।
आपका जीवन अंधविश्वास, ढोंग, पाखण्ड, धर्म , जाति आदि सभी प्रकार के अंधकार से मुक्त होकर प्रकाशमान हो ऐसी कामना करता हूँ ।
नमोह बुद्धाय