मैं नाराज हूँ,खुद की नाकामियों से,
फ़ासला चंद कदमो का,वो भी मुझसे मिटाया न गया ।
एक ही चाह थी तुझे पाने की बस, बस एक तू ही पाया न गया ।
कहने को तो एक उम्र गुज़ार दी हमने ,संग तेरे एक लम्हा बिताया न गया ।
मैंने चाहा ,तूने चाहा ,रब की भी मर्जी थी शायद,
न जाने किसकी बद्दुआ थी,जो हमे मिलाया न गया ।
इससे खुशहाल थी जिंदगी ,जब तू न था ,
तेरे बाद ,कोई लम्हा हस के बिताया न गया ।
मैं उतरना चाहता था,तेरी निगाहों के आईने में ,
मैं चला तो था तेरी ओर, मुझसे जाया न गया ।
तेरी कोई खता नहीं ,न खता तेरे हुश्न की ,
कमजर्फ दिल ही ऐसा मेरा ,तेरा नाज उठाया न गया ।
बस नज़र अंदाज़ ही तो करना था तेरी बेवफाई को ,
आग तो बुझा दी गयी ,धुएं को दबाया न गया ।
मेरे महबूब तू , हसता होगा मेरे हाल पर
तेरे बाद मुझसे कभी मुस्कराया न गया ।
चाहत तो थी छू भर ले तेरा चाँद सा बदन , मैला हाथ बढ़ाया न गया
चाहत तो थी बना ले खुद सा तुझको, पर तेरी पाक रूह तक जाया न गया ।