सुदंर गजल ..
काफिया .आ ।
रदीफ .क्यूं नहीं ।
सुख गयी फसल यूं ही देखते देखते ।
फसल खिलाने सावन आता क्यूं नहीं ।।
भुख से सारी आंते बाहर आ गयी ।
एक निवाला भोजन का देता क्यूं नहीं ।।
मानव होकर मानव को ही खा गया ।
मानवता का नाता निभाता क्यूं नहीं ।।
जिस देश में रहता उससे गद्दारी की ।
देश प्रेम दिल में जगाया क्यूं नही ।।
कंचे ,गुल्ली डंडे खेलने में जीवन गया ।
बचपन की यादें अब भुलाता क्यूं नहीं ।।
गम पसरा है सारे जहां में बेसुमार सा ।
खुशी के गीत कोई गाता क्यूं नहीं ।।
जी लिया अपने वास्ते तू बहुत खुब ।
दूसरों के वास्ते जरा जीता क्यूं नहीं ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,धंबोला ,जिला डूँगरपुर ,राजस्थान ,हाल .अमदाबाद ।