मैं उन पलों में ठहरी हूँ,
तुम जा रहे थे,
मैं पथरायी आँखों से देख रही थी,
नमी को रोक दिया था मैंने पलकों पे,
ताकि अन्तिम दृष्टि तक तुम्हें देख सकूं.
देखते ही देखते,
तुम गोधूली के बादलों में खोकर
ओझल हो गए थे.
जानती थी,
भविष्य के गर्भ में महाभारत है,
तुम अब कभी वापस वृन्दावन नहीं लौटोगे.
सूरज ढल चला था,
वृन्दावन की धरती का ऋण मुझ पर बाकी था.
पावों को वापस सन्नाटे भरी कुञ्ज गलियों में घसीट रही थी.
तभी लगा तुम्हारी बांसुरी कहीं पुकार रही थी,
तुम्हारा पीताम्बर उस अँधेरे में सूर्य-किरण सा लगा,
तुम्हारा श्यामल वर्ण जमुना में घुला सा लगा,
और तुम्हारी भुवन-मोहिनी मुस्कान,
आकर मेरी पलकों पे बैठ गयी.
ठहर गयी हूँ तब से,
तुम्हारे जाने के पीड़ा में डूब जाऊं
या हर पल में तुम्हारे होने का उत्सव जियूं
बताओ #कृष्ण ?
#तीन_युग