सुदंर कविता ..
कल एक झलक जिदंगी को देखा मैंने ,वो राहों में चली गुनगुना रही थी ।
फिर ढूँढ़ा उसे इधर उधर ,वो आँख मिचौली का खेल कर रही थी ।।
एक अरसे के बाद मुझें करार आया ,वो सहला कर मुझें सुला रही थी ।
वह मेरे से बहुत ही खफा सी थी ,मैंने पूछा उससे क्यूं जिदंगी इतना दर्द दे रही है ।।
वो एक पल हंसी और बोली ,अरे पगले मैं तो जिदंगी हूँ तुझे जीना सीखा रही थी ।
बेदर्द जमाना है तू नीरा अकेला ,मैं तो तेरे लिए सुकून की नयी राह सजा रही थी ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,धंबोला .जिला .डूँगरपुर ,राजस्थान ,हाल .अमदाबाद ।