वो नाराज़ बैठे थे , हम खामोश बैठे थे ।
पहल कौन करे इस इंतेज़ार में बैठे थे।।
ढल गयी शाम चलने का वक़्त हो गया।
उठे थे साथ और साथ चल रहे थे।
न वो हमे देख रहे थे न हम उन्हें देख रहे थे।।
प्यार तो न था बेशक ये अहम की लड़ाई थी
वो अपने मे जी रहे थे हम अपने मे जी रहे थे।।
©satender_tiwari_brokenwords