बिना अल्पना चौखट सूनी याने मांडने की कला
राजस्थान हो या गुजरात। मालवा या निमाड़ या दक्षिण भारत लगभग हर घर में द्वार चौखट को पूजने की समृद्ध परंपरा है। त्योहार हो या कोई अन्य शुभ अवसर। घर की स्त्रियां आंगन और मुख्य द्वार पर अल्पना अवश्य अंकित करती हैं। दीपावली तो त्योहारों का त्योहार है। मां लक्ष्मी की अनुकम्पा कौन नहीं चाहता। लक्ष्मी आए घर-द्वार उसके स्वागत में अल्पना का अंकन आवश्यक हैं।
लोक संस्कृति की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक उज्जवल पक्ष है माण्डणा। वास्तव में माण्डणा कला-कलात्मक सौन्दर्य की सार्थक अभिव्यक्ति है। माण्डणे स्थान की शोभावृद्धि करते हैं। उमंग, उत्साह, उल्लास का सृजन भी करते है और वातावरण को रस से भर देते हैं।
उत्तर प्रदेश में ‘चौक पूरना’, बंगाल में अल्पना, बिहार में ‘एपन’, महाराष्ट्र का ‘रंगोल’, माण्डणों के ही विविध रूप हैं।
माण्डणों की प्राचीनता स्वयंसिद्ध हैं। वेदों-पुराणों में हवनों और यज्ञों में वेदी और आसपास की भूमि पर हल्दी, कुमकुम आदि से विभिन्न आकृतियां बनाई जाती थी। भगवान राम के अयोध्या आगमन पर अयोद्धवासियों में अपने घरों को माण्डणों से सजाया था। प्राचीन समय में घर-आंगन सजाने का एकमात्र साधन यही था। ग्रामीण अंचलों में आज भी इस विधा का बहुत महत्व है।
माण्डणे की तैयारी -ः चूंकि माण्डणा भूमिचित्र है इसलिए घर के प्रवेश द्वार के बाहर से लेकर अन्दर चौक और हर कमरे की भूमि को साफ लीप-पोत कर उस पर धान के दाने बिखेर कर माण्डणों की तैयारी की जाती है। जहां-जहां धान के दाने हैं उन स्थानों से होकर लक्ष्मी जी आएंगी ऐसी मान्यता है और उन स्थानों पर माण्डणे अवश्य मांडे जाते हैं। माण्डणों के लिए स्थान तय कर लेने के बाद रंगों और माण्डणों की डिजाइन का चयन किया जाता है। साधारणतया अल्पना के लिए कपडे़ की बारीक कुची बनाई जाती है। हाथ की अंगुलियों और अंगूठे की मदद से भी भांति-भांति के माण्डणे विभिन्न अवसरों के अनुरूप बनाए जाते हैं।
लाल गेरू से मुख्य आकृति बनाकर उसमें सफेद चूने (खड़िया) से रेखाएं भर कर माण्डणों को पूरा किया जाता है। माण्डणे की बाहरी भाग को भी कलात्मक सज्जा दी जाती है।
लक्ष्मी के पूजा-स्थल पर लक्ष्मी-पाटवा बनाया जाता है। उसके चारों और अन्य मंगलसूचक चिन्ह मांडे जाते हैं।
आजकल आधुनिक और पढ़ी लिखी महिलाएं भी तैल रंगों से भी माण्डणे बनाने लगी हैं, लेकिन फिर भी घर-आंगन में एकाध माण्डणा गेरू व खड़िया का अवश्य बनाया जाता हैं।
बचपन से ही कन्याओं को माण्डणे की कलाएं सिखा दी जाती हैं। भरा-पूरा परिवार, भरा-पूरा आंगन और भरे-पूरे माण्डणे मां लक्ष्मी को हर पल आमंत्रित करते रहते हैं। माण्डणे की कला हृदय की भावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति हैं।
दिवाली पर माण्डे जाने वाले माण्डणों पर किसी को पांव नहीं रखने दिया जाता है। इन्हें कभी मिटाया भी नहीं जाता। यह अपने आप लगाता र चलने से मिट जाते हैं।
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यशवन्त कोठारी
86, लक्ष्मीनगर, ब्रह्मपुरी बाहर
जयपुर - 302002