फ़र्ज़ का क़र्ज़ (भाग ३)
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क्या लगता है बिलाल , बट्ट साहब सच कह रहे है इन्हें कुछ पता होगा की नही? ..... कुछ कह नहीं सकते मेजर संदीप। बिलाल ने जवाब दिया। दोनों का अच्छा ख़ासा याराना था । इंस्पेक्टर बिलाल और मेजर संदीप अपने अपने ओहदों के अतिरिक्त काफ़ी बेतकल्लुफ़ से थे। अक्सर कश्मीर की समस्याओं पर बहस करते थे। ...... सेना में बट्ट साहब का बहुत अच्छा रेकोर्ड और रुतबा है वैसे।..... वो ठीक है मेजर लेकिन ये जो धर्म होता है ना ये आदमी को जो ना बना दे वो कम। ..... क्या मतलब बिलाल? देखो संदीप मेरा मानना है कि धर्म जब तक दिल में रहे सही रहता है लेकिन जब ये दिमाग़ पर चड जाए , बहुत ख़ौफ़नाक हो सकता है। और आज कल मेरे इस चमन जैसे कश्मीर में धर्म कुछ ज़्यादा ही दिमाग़ में चढ़ गया है कुछ लोगों के। ..... तुम्हारे क्यूँ नहीं चढ़ा फिर? संदीप ने हँसते हुए पूछा। ......क्यूँकि मैं खुदा में ख़ुद को ढूँढता हूँ । ख़ुद में खुदा को नहीं। ......वाह! भाई बिलाल गहरी बात कह गए तुम तो। काश सब समझ पाते इस को। हमारा सारा मुल्क जन्नत हो जाता। .....संदीप मुझे अब भी यक़ीन नहीं है की बट्ट साहब को कुछ भी पता नहीं होगा। थोड़ा नज़र रखनी ज़रूरी है। ........देखो तुम और कुछ पता चले तो मुझे बताना कह कर मेजर संदीप अपनी जीप की तरफ़ बढ़ गया।
अहसान बट्ट को दो साल पुरानी बातें याद आ रहीं थी की कैसे उन्होंने नदीम को भी फ़ौज में भर्ती होने के लिए मनाने की कोशिश की थी लेकिन नदीम कहता था नहीं अब्बू मुझे तो बड़ा बिज़्नेसमेन बनना है। बड़ी फ़ैक्ट्रीज़ का मालिक बनना है। वो एक मेधावी छात्र था और इंजीनिरिंग करना चाहता था। उसने कहा अब्बू आप तो मुझे मकैनिकल इंजीनिरिंग करवा दो फिर देखो मैं कैसे नए नए अविष्कार करता हूँ । अपना भी बड़ा ब्राण्ड होगा और सारे देश और विदेशों में हमारे बनाए समान की डिमांड होगी। मैं आप दोनों को वो सब ख़ुशियाँ दूँगा जो आप को अभी तक नहीं मिलीं। उसका जोश और उत्साह देख कर बट्ट साहब ने उसका दाख़िला जम्मू के इंजीनिरिंग कॉलेज में करवा दिया था। पिछले दो साल से वो वहीं होस्टल में रह कर अपने सपनों को पंख दे रहा था । कम से कम उन्हें तो यही लगता था। कई बार घर भी आता था। पिछले एक साल से उसके व्यवहार को आए कुछ बदलाव को उन्होंने नोटिस किया था लेकिन अधिक तवज्जो नहीं दी थी। पिछले एक साल से वो अधिक गम्भीर हो गया था। कश्मीर की समस्याओं पर बहुत सवाल करता था और थोड़ा अधिक धार्मिक हो गया था। उन्होंने इसे उसके बदले माहौल का असर समझ और उसके परिपक्व होने की निशानी जान कर नज़रअन्दाज़ कर दिया था। काश की उन्होंने थोड़ा और गहराई से देखा होता।
क्रमश:
दीपक जैन