बैठे हैं इस इंतज़ार में कि बो बापिस आयेंगे
पूछेंगे हाल मेरे दिल का कुछ अपनी सुनायेंगे
अश्क बहेंगे आँखों से लव न खुल पाएंगे
बो मंजर अपनों को हम हँस कर सुनायेंगे
दिन कटा शाम ढली रात भी गुजर गई
उसके इंतज़ार में ये जिन्दगी भी सिमट गई
दिए का तेल ख़त्म होते ही लौ भी बुझने लगी
तुझसे मिलने की तलब अब साँसे भरने लगी
लोट आए सब पखेरू घरोंदो में अपने
सावन की रिमझिम बुंदे भी तो बरसने लगी
आस्को की धारा मुझसे ये कहनें लगी
लोट जा घर को कि देर अब बहुत होने लगी
- Rj Krishna