इतना गिर गयी हूँ मैं कैसे ये सवाल हमेशा डसता था।लेकिन मेरे पास भी इसके सिवा अब और कहाँ कोई रस्ता था।उस वक़्त बहुत मैं रोई थी हद से ज्यादा चिल्लाई थी।दूसरों के हाथ आस्तित्वहीन हा जब खुद को मैं पाई थीपर रो-रो के सारे आंसू एक रोज़ बहा डाला ।मैंने हर अरमान का गला घोंट कफ़न ओढा डाला मैंने पर अब पेट भर जाने पर भी जब नीद नहीं आती रातों कोनहीं सँभाल पता है ये दिल तब इन बिखरे जज्बातों को।
"दोस्त"