अक्सर हमारे पास एक बहाना होता है। एक खीच होती है कि संसार में हम करे तो क्या करे। जो हम करना चाहते है वो पहले ही कोई ओर कर चुका है। हमारे पास कुछ कर ने के लिए ही नहीं है। यदि आपको उदाहरण दू तो इन पूजा की थालियो को ही देख लीजिए पहले से ही सब कुछ सज्ज करके रख दिया गया है। अब ऐसे में हम सोचते है की करना क्या शेष है सब कुछ तो पहले ही हो चुका है। अब यहां पे समस्या कर्तव्य में नहीं यहां पे समस्या हमारी सोच में है। हम ये सोचने में समय व्यतीत करते है कि क्या हो चुका है। हमें ये सोचना चाहिए कि क्या करना अभी शेष है जिसमें हम अपना योगदान दे सकते है। समझे । संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं जो पूरा हो आप सभी उसे आगे बढाने के लिए प्रयास कर सकते हो। आप उस कार्य को और श्रेष्ठ बना सकते है। बस आवश्कता है तो सकारात्मकता की।