जागो कुर्सी के दीवानों
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जब उदय हुआ हो सूरज का तब आँख बंद कर लेने से
या चमगादड़ की दोष दृष्टि से रात नहीं होने वाली
हनुमत को है पता चल गया कालनेमि छल माया की
चरमपंथ धन हरण पंथ की बदली वाली छाया की
अब उत्पात मचाने से जो है वह भी लुट सकता है
बचना चाहो तब उम्मीदों सेवा करो रिय़ाया की
सागर की तपिश मचलती है तब धरती सिंचित होती है
ईंधन जलकर छाये घन से बरसात नहीं होने वाली
सोई हुयी आत्मा पर अब कुछ ईमानी चोट करो
हे जन सेवक भाग्य विधाता थोड़ा कुछ कम नोट भरो
बेईमानी ऊपर वाला अधिक नहीं चलने देगा
मौका भी दस्तूर भी यही कर्म न अब तो खोट करो
जब एक रास्ता बचा हुआ हो चक्रव्यूह से जाने का
सामने कुआँ पीछे खाईं तब भीतर घात नहीं होती
नीचे जन मन महासमंदर ऊपर नैतिक घन छाया
वक्र दृष्टि के साथ निहारे अधर हास धर शनिराया
शब्द लेखनी प्रबल हुयी है जन मन की झंकारों से
हंसों ने पर खोल दिए हैं नैतिकता को दे छाया
जब बादल फटता है अम्बर सैलाब रोकने कूप चले
बरसाती ताल तलैयों में ऐसी औकात नहीं होती
Kuber Mishra