पत्थर
ये भीड़ है बाबू, नासमझ भीड़
भीड़ जानती है
सिर्फ पत्थर को पूजना
पत्थर से मारना
पत्थर हो जाना
और पत्थर पर नाम खुदवाना
चीखोगे चिल्लाओगे नहीं सुनने वाले
समझाना चाहोगे नहीं गुनने वाले
चुपचाप चलोगे नहीं बूझने वाले
हाँ, पागल कहकर पत्थर जरूर मारेंगे
तुम चाहते हो आदमी बनें रहे
मेरी मानो ! बैठ जाओ कहीं भी
पत्थर होकर।