काव्योत्सव प्रतियोगिता हेतु
(भावनात्मक )
मनभावन चरित्र
ॐ ध्वनि सी पवित्र है माँ
भगवान सा चरित्र है माँ
जिंदगी के केनवास का
एक सुंदर सा चित्र है माँ
महका दे जीवन गुलाब सा
ऐसा मनमोहक इत्र है माँ
हर सुख दुख में रहती संग
सच सबसे सच्ची मित्र है माँ
आशीष देता बुलंदियाँ हमें
सम्भावना भरा चरित्र है माँ
जिसके स्पर्श से जगती आस
गंगा जमुना सी पवित्र है माँ
डॉ लता अग्रवाल
भोपाल
हस्ताक्षर थे पिता
चली आती थीं
सायकिल पर
होकर सवार
खुशियाँ,
शाम ढले
नन्हें-नन्हें उपहारों में
संग पिता के
घर का उत्सव थे पिता |
संघर्षों के
आसमान में
बरसती बिजलियों से
लेते लोहा
ऐसी अभेद दीवार थे पिता |
चिंताओं के कुहरे से
पार ले जाते
अनिश्चय के भँवर में
हिचकोले लेती
नाव के कुशल पतवार थे पिता |
चहकते रहते थे रिश्ते
महकती थी
उनसे प्रेम की खुशबू
सम्बन्धों के लिये
ऐसी कुनकुनी धूप थे पिता |
जिन्दगी की
कड़ी धूप में
नहला देते
अपने स्नेह की
शीतल छाँह से
ऐसे विशाल बरगद थे पिता |
घर -भर को
नया अर्थ देते
जिन्दगी के
रंगमंच के
अहम किरदार थे पिता ।
हर परीक्षा में
हमारी
सफलता -असफलता की
रिपोर्ट कार्ड के
महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थे पिता |
आज
उत्सव के अभाव में
गहरा सन्नाटा है घर में
चहुँ ओर
कड़कती हैं बिजलियाँ |
जीवन नैया
फसी है भंवर में
कुनकुनी धूप के अभाव में
दीमक खा गई
रिश्तों को
एक अहम किरदार के बिना
सूना है
जीवन का रंगमंच
सफलता – असफलता के
प्रमाणपत्र
बेमानी है
एक अदद हस्ताक्षर के
बिना ।
डॉ लता अग्रवाल
भोपाल