#Kavyotsav 2
Emotions (भावना)
मेरी कविता
डायरी वाला किराये का मकान छोड़कर
पत्रिका रूपी घर तलाशती मेरी कविता
पहुँच तो जाती है, संपादक की टेबल पर
बिना पढ़े, बिना कोई दृष्टि डाले
स्तरहीन बताकर टेबल से रद्दी की टोकरी
का सफर तय करती है मेरी कविता।
आज चारों तरफ भ्रष्टाचार का बोलबाला है
छपती है उसी की रचना जो संपादक
का भाई या साला हैं
यह कलयुग हैं, यहाँ कोई न धर्मयुद्ध न कर्मयुद्ध
नीतिविहीन दुर्योधन नहीं, धर्मात्मा यु्धिष्ठर नहीं
फिर क्यों प्रकाशक के भाई-भतीजो से
हार जाती है मेरी कविता
हो सकता हैं मेरी कविता में बच्चन जैसा रस नहीं
'निराला' जैसा मर्म नहीं, 'महादेवी' जैसी शब्दों पर पकड़ नहीं,
'प्रसाद' जैसा सोन्दर्य नहीं,
'पंत' जैसी परिपक़्वता नहीं
पर मुझे यह ज्ञात है कि
नये साहित्यकरों की परिपाटी पर
खरी उतरती है मेरी कविता
भावों को क्या कभी कोई समझ पाएँगा?
कोई हैं जिसने पाषाण हृदय नहीं पाया हैं
क्या मेरे शब्द किसी से स्नेह के बंधन को बाँध सकेंगे?
या हमेशा तिरस्कृत होती रहेंगी मेरी कविता?
कब तक यूँ वापिस लौटाई जाएँगी
मोटे चश्मे में अनुभवी बने संपादको को कब तक
कम उम्र की नज़र आएँगी।
इस सवाल का जवाब
ढूँढ़ते-ढूँढ़ते बूढ़ी हो रही हैं मेरी कविता।