#काव्योत्सव2 .0
"कहूँ क्या प्रिये याद आने लगी हो"
नयी सुबह आयी, नया है सवेरा,
नयी टहनियों पर नया बसेरा,
मेरे मन को तुम गुदगुदाने लगी हो,
कहूँ क्या प्रिये याद आने लगी हो।।
है पहला ही सावन तेरी याद आयी,
ये सौतन कोयलिया मधुर गीत गायी,
ये बारिश की बूंदो के कलरव की तानें,
बताओ प्रिये अब ये दिल कैसे माने,
कटी कैसी रातें शिकायत नहीं है,
उजालों में भी तुम सताने लगी हो।।
पड़ी ओस बूंदों को मैं सेंकता हूँ,
नयी कोपलों में तुम्हें देखता हूँ,
समंदर किनारे मकां मेरा लेकिन,
मैं प्यासा हूँ पानी में गम फेंकता हूँ,
मेरे दिल के दरिया में हलचल मचाने,
लहर बनके तुम लहलहाने लगी हो।।
निगाहें निगाहों से मिल जो गयी हैं,
मिलीं पलकें पलकों से छिल जो गयी हैं,
हैं उजली सी रातें करूँ दिल की बातें,
हुआ दिल अमीरा तुम मिल जो गयी हो,
इन "सागर" की बाहों में मौजें हैं कितनी,
पलक बंद कर तुम बताने लगी हो।
मेरे मन को तुम गुदगुदाने लगी हो,
कहूँ क्या प्रिये याद आने लगी हो।।
-राकेश सागर