#काव्योत्सव2 #प्रेरणादायक
कौन हो तुम ?
प्रश्न "अक्सर यह कई बार दोहराया
पहचान ही खुद से खुद की
कौन समझ पाया ?
झाँका ,मैंने आँखों में वक़्त की
और धीरे से फुसफुसाया
एक छवि न जाने किसकी
नजरों में समायी
दिल की बात धीरे से लबो पर आई
मैं हूँ एक नदिया ..
जो बहती है अपने ही भीतर
ज़िन्दगी के हर मुश्किल मुकाम पर
तुमने ही तो बहना सिखाया
उदास जब भी हुआ मनवा
तुमने हँसना सिखाया
जब भी डगमग हुआ विश्वास मेरा
तुमने ही मेरी इच्छा शक्ति को जगाया
अब मुझसे क्यों करो सवाल तुम
कौन हूँ मैं ? और यह खेल किसने रचाया
मैं से मैं "की पहचान खुद की बातचीत से ही हो पर विश्वास खुद पर भी हो और उस शक्ति पर भी जो वक़्त की धारा में हमें बहाये चलता है