'''''''''''''''''''ताप तन मे'''''''''''''''''''''
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है प्रखर इक ताप तन मे।
भय नहीं भयपाप जन मे।
मैं नहीं यूं जल रहा
बुझ रही वो आग मन मे।
है प्रखर इक ताप तन मे।
है प्रखर इक ताप तन मे।
उस वक्त़ को न झांक अब तू।
अग्नि है जल माप न तू।
मैं कहूँ या वो कहे
सह नहीं कोई शाप अब तू।
इक इल्म मे कई जुल्म न कर
बन न अरि बाप क्षण मे।
है प्रखर इक ताप तन मे।
है प्रखर इक ताप तन मे।
धड़ कहीं तो सर कहीं।
पर कहाँ वो पर कहीं।
हम परिन्दे वो दरिंदे
धूप मे वो ज्वर कही।
मैं उसका क्या बिगाडू
सूर्यताप है जिसके तन मे।
है प्रखर इक ताप तन मे।
है प्रखर इक ताप तन मे।
*प्रिन्शु लोकेश तिवारी*