इस भागदौड़ के चक्कर में
कितना कुछ पीछे छूटा है,
इन गलियों की ख़ामोशी कहती
“बदलते वक्त ने मोहल्ला लूटा है..”
अब कहाँ वो महफ़िल लगती है ?
जहाँ बूढ़ी अम्मा हँसती थी
अब कहाँ वो बिटिया अपनी रही
जो कहानी सुनने की जिद करती थी...
अब कहाँ वो पटिया रखी है ?
जिस पर बैठकर गप्पें लड़ाते थे...
अब कहाँ रहे वो बुढ्ढे बाबा
जिन्हें बच्चे बहुत सताते थे...
अब कहाँ गया वो छोटा नल
जो सबकी प्यास बुझाता था
अब कहाँ रहा वो ‘झोली बाबा’
जो अक्सर हमें डराता था..
कहाँ गयी वो ‘गोल सी चिम्मक’
जिसे लोहे पर चिपकाते थे
वो ‘कागज़ की नाव ’ भी गल गयी शायद
जिसे नालियों में हम चलाते थे।
कहाँ गया वो ‘मेरा झूला’
जिसे नीम के पेड़ पर लटकाया था
कहाँ गए वो ‘मिट्टी के बर्तन’
जिन्हें गेरू से मैंने सजाया था..
कहाँ गयी वो ‘मेरी गुड़िया’
जो पुराने कपड़ों से मैंने बनवाई थी
कहाँ गयी वो ‘मेरी सहेलियाँ’
जिनसे करती खूब लड़ाई थी...
कहाँ गयी वो ‘पापा की साइकिल’
जिस पर छोटी गद्दी लगवाई थी
और मुझे बैठाकर हर शाम
जिन्होंने मोहल्ले की गली घुमाई थी..
कुछ सालों में सब बदल गया
वो वक्त जो था वो गुजर गया..
नये नये के चक्कर में पुराना कितना कुछ छूटा है
गलियों में रंगत भले ही हो लेकिन...
वक्त ने मोहल्ला लूटा है।