# काव्योत्सव २.० # भावना प्रधान
फिर वही रात है
फिर वही फसाने है
कलम मेरी मसरूफ़ है
रचने नए तराने हैं।
सोच को शब्द में
मै पिरोऊं कैसे
कुछ शब्द मेरे अपने हैं
कुछ शब्द बेगाने हैं।
दिल कहता है कुछ लिखने को
लेकिन दिमाग़ रोक देता है
कहता है मुझसे तुझे
रिश्ते भी तो निभाने हैं।
नए शब्द तकल्लुफ करते हैं
समानें को मेरी रचना में
अभी दिल बहला लो इनसे
जो शब्द थोड़े पुराने हैं
फिर वही रात है
फिर वही फसाने हैं।