#काव्योत्सव
***उजाले का मसीहा ****
"भावप्रधान "
अंधेरे दूर करने को ,उजाले का मसीहा चाहिए ।
जिंदगी जीने के लिए और तजुर्बा चाहिए ।।
चाहे जितनी जंग जीतो ,प्यार के खातिर यहाँं ,
अपना बनाने के लिए ,दिल भरा प्यार चाहिए ।
टूट कर टुकड़ों में मेरा , अक्स बिखरा है जहां ,
आईना उसको बनाकर ,एक राजदारा चाहिए ।
हमको चाहे जितना तोड़ो, हम ना टूटेंगे कभी ,
तुम टूट जाओगे पल में , बस एक शिगूफ़ाचाहिए ।
उलझने है ढेर सारी ,सलवटे भी कम नहीं ,
मझधार में नैया ही मेरी ,बस किनारा चाहिए ।
नमिता "प्रकाश"