#Kavyotsav2
कभी फेरो हाथ आहिस्ता
तुम्हे गुदगुदी लगेगी।
टुकड़े टुकड़े हंसी के मैंने
नर्म लबों से अपने जोड़े हैं
बड़ी गिरहें हैं लबों पे
कभी फेरो हाथ आहिस्ता
तुम्हे गुदगुदी लगेगी।
नींदे पिघली हैं आँखों में
रातें सीली है पलकों से
ख़्वाबों की गाँठें उभरी हैं
कभी फेरो हाथ आहिस्ता
तुम्हे गुदगुदी लगेगी।
मेरे नम-नम से गालों पे
जो बीज बोये थे साँसों के
तुुम्हारी धड़कनों के पौधे निकले हैं
कभी फेरो हाथ आहिस्ता
तुम्हे गुदगुदी लगेगी।
जो इक बूँद तुम्हारी आँख से
मेरे गिरी थी जलते सीने पे
वो ठंडी ओस बनकर ठहरी है
कभी फेरो हाथ आहिस्ता
तुम्हे गुदगुदी लगेगी।
written by-"NISHANT"