#Kavyotsav2
विषय : भावनाप्रधान कविता
॥ नया साल ॥
दिन तीन शतक पैंसठ गुज़रे-
बारह महीने, चौबीस पक्ष ।
बीता है एक वर्ष मानो-
या घूम गया है समय-चक्र ।१।
ख़ुशियों की बूँदे झरीं मगर
कुछ हाथ लगीं कुछ फिसल गयीं ।
आलिंगन करतीं स्मृतियाँ
कुछ ठहर गयीं, कुछ निकल गयीं ।२।
कुछ चाहत रहीं अधूरी सी
कुछ अरमां मंज़िल पा न सके ।
बैचेनी में निद्रा टूटी
आकार स्वप्न कुछ पा न सके ।३।
फिर भी न गिला-शिक़वा कोई
ऐ वक्त ! चला हूँ साथ तेरे ।
कुछ नियति भाग था...छूट गया
बाक़ी तो आया हाथ मेरे ।४।
मैं कर्मलीन, मैं श्रमसाधक
हर इक क्षण मुझको प्यारी है ।
जो बीत गयी सो बात गयी -
अब आगे की तैयारी है ।५।
हाँ...अब आगे की तैयारी है. . .
- उदय