# काव्योत्सव2.0#गीत
इन नयन में तुम बसी हो,
उन नयन में मैं बसा हूँ,
कोई मुझको तो जँची है,
मैं किसी को तो जँचा हूँ,
जब नयन से नयन का,
मिलना मिलाना हो गया है,
तब से तेरे इश्क में ये,
दिल दिवाना हो गया है।।
जम के बरसो आ गए हो,
जो हमारे गाँव में,
जन्मों से तपता फिरा हूँ,
ले लो अपनी छाँव में,
इस मरुस्थल की तरफ,
नदियों का आना हो गया है,
तब से तेरे इश्क में ये,
दिल दिवाना हो गया है।।
कोयलों सी कुहकती हो,
बन कली तुम महकती हो,
बर्फ सा ना पिघल जाऊं,
दामिनी दी दहकती हो,
उस गली में जब से जाने का,
बहाना हो गया है,
तब से तेरे इश्क में ये,
दिल दिवाना हो गया है।।
काव्य के संगीत में,
शब्दों का रस घुल जाएगा,
जो जमी है धूल सपनों पर,
वो सब धुल जाएगा,
जिस्म दो हैं पर दिलों का,
इक ठिकाना हो गया है,
तब से तेरे इश्क में ये,
दिल दिवाना हो गया है।।
-राकेश सागर