॥ कन्यादान ॥
बेटी का बाप बना कर,
क्यों चैन हर लिया मेरा।
ऐ खुदा ! बता दे मुझको,
कब बुरा किया क्या तेरा॥
खाता हूँ ठोकर दर- दर,
फिरता हूँ मारा - मारा ।
कन्या क्यों भेजी घर में,
क्यों लूट लिया सुख सारा॥
वर बेटी हित चुनने को,
जब बढ़ते कदम हमारे।
पग थमे नयन चकराए,
दुनियां के देख नजारे॥
लाखों की बोली सुनकर,
गम्भीर कलेजा डोला ।
सब ताप गिरा तन-मन का,
हिम सम शीतल था चोला॥
पैसे के आगे जग में,
ना टिके शील सुन्दरता।
दौलत की तुला बनाकर,
सद्गुण जग तौला करता॥
दौलत की खातिर घर में,
बेटी है प्रौणा क्वारी ।
इस दहेज रूप दानव ने,
कर डाली मेरी ख्वारी॥
प्रभु बेटी ही देनी थी,
तो दौलत भी दे देता ।
कन्या का ब्याह रचा कर
मैं ‘कन्यादान’ ले लेता॥
- उदय