है पौरूष तन में जन्म लिया,
पर संवेदनहीन नहीं प्रियतम ,
जब-जब होती है पीर तुम्हे ,
मेरे भी नीर से भरे नयन,
इच्छायें हैं मेरी भी ,
खुशियों से भर दूं मैं सारा जीवन ,
तुम मानो या ना मानो पर ,
है प्रीति बहुत तुमसे प्रियतम //
जब भी अभियोग मढ़ा मुझपर,
तब-तब मुझको संताप हुआ ,
अनुराग तुम्हारा था पावन,
मेरा तो बस अपराध हुआ,
अश्रु से कह जाती हो तुम,
हृदयंतर की व्यथा प्रिये,
मैं कुटिल हूं भाव छिपाने में ,
पर तुम सरल हृदय प्रियतम//
कुछ क्षण ही वक्त बिताया साथ,
उसमें समाया है जीवन,
जितनी उत्सुक तुम मेरे लिए ,
उतना ही आतुर है मेरा मन ,
हम दोनों का संगम तो ,
निर्णय है भाग्यविधाता का ,
पर सच बतलाता हूँ तुमको,
मैं काया हूँ तुम अंतरमन//
मुझमें मेरा कुछ अंश नहीं ,
बस तेरा ही आयाम प्रिये,
जैसे मैं एक पतंगा और,
तू है मेरा आसमान प्रिये,
फिर तुमने कैसे ये सोच लिया ,
है प्रीति नहीं तुमसे प्रियतम ,
शब्दों से अकथ रहा है निरंतर ,
यह संगम भावों का है प्रियतम//