बहुत मुश्किल हालात थे उसके, वो बयां नहीं कर पाई। हर लम्हा खुद को खोकर सबको खुशी दे आई। क्या सुनेगा कोई उसके लफ़्ज़ों को, वो तो खुद का दांव खेल आई। चली थी डोली में सज धज के, किसी के आंगन की तुलसी बनने। मौत को गले लगा आई, फूल सा कोमल मन था उसका। उसे भी घावों से सह आई। हार गया बजूद उसका दुःख की बौछारें जब हद से ज्यादा बढ़ गयी। कुछ लम्हे ही बचे जीने के और खुशियां कुर्बान कर आई।