कविता
ओ हवाओं घटाओं फिजाओं
और शाम की गहरी उदासियों
जो भी हो तुम सब जाओ और
मेरे प्रिय से कहकर आओ कि
मैं प्रेम में डूबी हुई कैसे दिन काट रही हूँ
मैं जी भी रही हूँ या नहीं,नहीं पता
मुझे कुछ नहीं पता
गर पता है तो इतना कि मैं
तुम्हें जी रही हूँ
तुम्हारा नाम लबों पर सजाये
पुकार रही हूँ कि
आओ मेरे प्रिय आओ
जहाँ भी मेरे प्रेम को महसूस करो और
मेरी फैली हुई बाहों में समा जाओ
आओ मेरे प्रिय आओ ll
seema aseem