#kavyotsav2 #shayari
GHAZAL :-)
तुझे पाने की हसरत में जहाँ को भूल बैठा हूँ,
ज़मीं को भूल बैठा हूँ आसमाँ को भूल बैठा हूँ,
हज़ारों लोग थे जब मैं चला था जानिब-ए-मंज़िल,
पहली रात की चाँदनी में कारवाँ को भूल बैठा हूँ,
यारों वलवले वो जलजले फिर से दिलाओ याद,
मैं मोहब्बत के हंगामों की दास्ताँ को भूल बैठा हूँ,
मैं जलते हुये बस्ती की राखें ले तो आया हूँ,
मगर ज़रा सी ग़फ़लत से धुआँ को भूल बैठा हूँ,
निगाहों से निगाहों में कयामत होती है कैसे,
मैं मोहब्बत की लर्ज़िश-ए-बयाँ को भूल बैठा हूँ,
Written by-"NISHANT"