#काव्योत्सव
प्रेम
आना चाहते हो
तुम फिर से वापस
तो आ जाओ
पर सुनो....
मिटा आना वहीं अपना गुरुर
क्योंकि, किसी भी रिश्ते में
गुरूर की जगह ही नहीं
फेक आना वहीं अपना स्वार्थ
क्योंकि स्वार्थ की सतह
पर रिश्ते नही टिकते
छोड़ आना वहीं सारी तकलीफें
अब मेरे पास तुम्हारी तकलीफें
समेटने वाला वो आँचल नहीं
जाते हुए देखा था न तुमने
सपने पड़े थे मेरे
टुकड़े-टुकडे बिखरे हुए
बीन रही थी मैं उन्हें
अपने आँचल में
उन सपनों के टुकड़ों को
फिर से जोड़ने का
एक नया सपना
इन आंखों में लिए हुए
तो रख आना वहीं अपने
सारे सपने भी
शायद जुड़ जाए
तुम्हारे मेरे सपने संग।