मै न व्यक्त कर पाऊंगी उस आलम की पीड़ा
जिस वक्त समाज का एक खौफ
मेरे ख्वाबों की आहुति ले,
मेरी आजीविका अस्त-व्यस्त कर देता
मैं प्रतिदिन खूद मे ही मचलती तड़पती
किसे जा अपनी व्यथा कहतीं
,कौन समझे इस युग मे पीर पराई
मेरे हसीन सपने जब मेरी आखों के सामने दम तोड देते
मैं तड़पड़ाती वहाँ खुद को रोक खुद मे समां लेती
फिर उठती एक आह विरह की मेरी रुह मे
और मैं हसते हुए खुद मे कैद कर अपने ख्वाबो को
चल पड़ती जीवन की एक नई राह पर
जब संतुष्ट हो जमाना मुझसे कह ही देता
यहीं रीत हैं जग की क्योंकि औरत है तूं ।
नाम :-प्रगति गुप्ता
#KAVYOTSAV