English Quote in Poem by NISHANT SINGH KUSHWAHA

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NAZM~"पहले"
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पहले तुम्हारी ज़ुल्फों से जब हवा
उलझते हुये सरसब्ज़ होती थी
तो कितनी लरजती थीं तुम्हारी ज़ुल्फें,
पहले जब हवा
तुम्हारी कानों की बालियों पे
अपने हाथों की दो उँगलियों से
ठक करके गुज़रती थी
तो एक झनक उठती थी तुम्हारे काँधे से टकराकर,
तुम्हारे बिन्दिए के इर्द गिर्द घुमती हुयी हवा
एक भँवर भी तो बनाती थी पहले,
रेत पर पानी की तरह
एक हया जब फैलती थी तुम्हारे चेहरे पर
तो ये नरगिसी आँखे तुम्हारी
नीमबाज़ हो जाती थीं,
जब तुम्हारे लबों से निकलते थे लफ़्ज़ों के तिनके
तो कितने सारे परिंदे उड़ते हुये आते थे
और हवा में ही हवाओं से झपट लेते थे वो सब तिनके,
एक मुस्कान जो तुम्हारे होठों की डोरियों को
रह रह कर खींचती छोड़ती रहती थी
क्या आज भी वो ऐसा करती है?

क्या आज भी वो सब होता है
जो पहले हुआ करता था।

written by-"NISHANT"

English Poem by NISHANT SINGH KUSHWAHA : 111158764
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